शनिवार, 6 अगस्त 2016

मूलभूत इलेक्ट्रॉनिकी - भाग २ (BasicElectronics - Part 2 Extrinsic )

भाग १  से आगे: 
(मेरा आग्रह है कि इस शृंखला की कोई पोस्ट सीधे न पढ़ी जाय बल्कि पहले भाग से होते हुये समस्त पूरवर्ती कड़ियों की निरंतरता में पढ़ी जाय।)  
पिछले भाग में हमने परमाणु की संरचना (ग्रुप ४) के पदार्थों में पाये जाने वाले संयोजी बंध और शुद्ध अर्ध संवाहकों पर चर्चा की।  अब देखें कि शुद्ध सिलिकॉन में यदि दूसरे समूह की अशुद्धि मिलाई जाए तो क्या होगा ?
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शुद्ध सिलिकॉन (समूह ४ - बाहरी कक्षा में ४ इलेक्ट्रान)) की संरचना पहले दो चित्रों में है।  शून्य डिग्री केल्विन तापमान पर पहले चित्र की तरह कक्षाओं में घूमते हुए सभी इलेक्ट्रान बंध में हैं जैसा कि पहले चित्र में दिख रहा है, लेकिन तापमान बढ़ने पर ये उछल कूद करने लगते हैं  जैसे हम धूप में आंगन में खड़े रहें तो उछलने लगते हैं। :)

कमरे के साधारण  तापमान (करीब ३०० डिग्री केल्विन) पर कुछ इलेक्ट्रान पूरी तरह बाहर कूद आते हैं और पीछे कोटर या रिक्ति (hole)  का प्राकट्य होता है। यहाँ सिलिकॉन है लेकिन जर्मेनियम की रचना भी ऐसी ही समझी जाय।

चित्र १ : शून्य केल्विन तापमान अर्थात परम शून्य पर स्थिति           चित्र २ : साधारण तापमान (लगभग ३०० डिग्री केल्विन या २३ डिग्री 
सेल्सियस अर्थात कमरे के साधारण तापमान) पर स्थिति 

नीचे के तीसरे चित्र में इस शुद्ध चौथे समूह के पदार्थ जर्मेनियम में पाँचवे समूह (ग्रुप ५ अर्थात बाहरी कक्षा में ५ इलेक्ट्रान) की थोड़ी सी अशुद्धि मिलाने पर स्थिति दर्शाई गई है।  अब ग्रुप ५ के हर एक परमाणु पर ५ इलेक्ट्रान होने से ४ तो बंध में भाग ले सकते हैं लेकिन अंतिम एक बंध से बाहर है। यह इसलिए कि  संयोजी बंध  पूरा होने पर भी एक इलेक्ट्रान बाकी है जो बाहर जाने को उद्यत है। (पिछले लेख में हमने देखा था कि स्थायित्व के लिए बाहरी कक्षा में ८ की संख्या चाहिए)



अब यदि थोड़ा भी विद्युत खिंचाव हो तो यह अतिरिक्त ऋणावेशित इलेक्ट्रान धनावेश की ओर दौड़ेगा। इस प्रकार बना अर्द्ध चालक गतिशील ऋणात्मक आवेश (Negative Charge) के कारण  N type अनियमित अर्द्धचालक कहलाता है।

इसके  इसके उलट यदि ग्रुप ३ की अशुद्धि हो तो ? नीचे की संरचना देखिये:


यहाँ पिछली बार से उलट स्थिति है।  एक इलेक्ट्रान कम है इसलिए एक बंध में ८ की जगह ७ ही इलेक्ट्रान हैं। इस कमी को कोटर कहिये जो धनाविष्ट होगा।  जब विद्युत क्षेत्र होगा तो यह कोटर  ऋणावेशित बिन्दु की ओर बढ़ना चाहेगा। कैसे जाए? यह दूसरी ओर के बंध में से एक इलेक्ट्रान को अपनी जगह भरने के लिए खींचने लगेगा।  जैसे ही वह इलेक्ट्रान यहां आयेगा, उसके स्थान पर कोटर बन जाएगा। इस प्रकार कोटर गतिशील हो खिसकता है। 

चूँकि इस तरह गतिमान कोटर धनावेशित अर्थात Positively Charged है, इसलिये इस प्रकार बना अर्द्धचालक P -type कहलाता है।

(आगे अगले भाग में)

बुधवार, 13 जुलाई 2016

मूलभूत इलेक्ट्रॉनिकी - भाग १ (Basic Electronics - Part 1)

मैं एक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर हूँ। हमेशा से महसूस करती आई हूँ कि काश हिंदी में पुस्तकें इससे संबन्धित जानकारी देती होतीं, तो कितने ही और लाभ ले पाते।  सो अपनी एक छोटी सी शुरुआत कर रही हूँ।  मुझे लगता है कि पहले २-३ भागों में जो आयेगा उसे विज्ञान से जुड़े सामान्य पाठक भौतिकी और रासायनिकी विषयों में पहले ही पढ़ चुके होंगे  किन्तु आगे बढ़ने से पहले नींव आवश्यक है इसलिए शुरुआत यहीं से कर रही हूँ।

इलेक्ट्रॉनिकी का आरम्भ भौतिक और रसायन क्षेत्र में होता है। पहले परमाणु (Atom)। परमाणु के मोटा मोटी दो मुख्य भाग हैं,  एक है धनावेशित  (Positively Charged, + ) भारी भीतरी भाग (जिसमे भारी धनावेशित प्रोटॉन और भारी अनावेशित न्यूट्रॉन (Protons and Neutrons)हैं, इसे नाभिक (Nucleus) कहते हैं और दूसरा इसके विपरीत ऋणावेशित (Negatively Charged, -) हल्के इलेक्ट्रॉन (Electron) जो भीतरी  नाभिक के चक्कर काटते रहते हैं। इलेक्ट्रॉन ही इलेक्ट्रॉनिकी विधा का मूल है। परमाणु के भीतर और भी बहुत कुछ है लेकिन इलेक्ट्रॉनिकी पढ़ते समय उस की गहराई में जाने की आवश्यकता नहीं।

ये दोनों चित्र देखिये :

  











परमाणु को सौर्य मंडल की तरह सोचिये। जैसे हमारी पृथ्वी और अन्य ग्रह सूर्य के केंद्र में रख घूम रहे हैं इसी तरह समझिए कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के आस पास घूम रहे हैं।  भीतरी इलेक्ट्रॉन नाभिक के आकर्षण से बहुत मजबूती से जुड़े हैं जबकि बाहरी वालों पर आकर्षण कम है। जैसे सौर्य मंडल में "प्लूटो" ग्रह बहुत दूर (बाहरी कक्षा में) होने के कारण सूर्य की आकर्षण शक्ति के बाहर भी माना जा सकता है (हालाँकि यह पूरी तरह सूर्य से स्वतंत्र नहीं) कुछ ऐसे ही सोचिये कि बाहरी इलेक्ट्रॉन भी स्वतंत्र हो कर बाहर भाग जाना चाहते हैं।  बस कोई और उन्हें बाहर खींचने के लिए शक्ति लगाए और वे भाग जाएंगे। किसी भी पदार्थ का एक परमाणु क्रमांक (Atomic Number) होता है और उसके हर परमाणु में उतने (बराबर बराबर) प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन होते हैं।  दोनों बराबर और विपरीत आवेशित हैं इसलिए पूरा परमाणु विद्युतीय रूप से तटस्थ (Neutral) है।

जब ये इलेक्ट्रॉन  बाहर निकल जाएंगे तो वे बाहरी विद्युत बलों से प्रभावित होने लगेंगे और जिस ओर धनावेशित कण उन्हें खींचे वे उसी दिशा में बहते चले जाएंगे।  यही प्रवाह विद्युत धारा (Electric Current) कहलाता है जिसकी दिशा इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह के विपरीत 'मानी जाती' है।  बाहरी इलेक्ट्रॉन के निकल जाने पर बाकी बचे धनावेशित भाग को धनावेशित आयन (Positive Ion) कहते हैं जिसमें इलेक्ट्रॉन पहले से ज्यादा कस कर नाभिक की आकर्षण शक्ति के वश में होते हैं।  बाहरी कक्षा में आठ (या शून्य) इलेक्ट्रॉन होने से परमाणु आसानी से इलेक्ट्रॉन लेता या देता नहीं है।  यदि बाहरी कक्षा में १ या २ या ३ इलेक्ट्रॉन हैं तो वे बाहर जाने की प्रवृत्ति दिखाते हैं।  यदि ५ , ६ या ७ हैं तो दूसरे से लेकर ८ बन जाने के प्रयास करते हैं। इन्हीं कारणों से परमाणु एक दूसरे के साथ बन्ध (Bond) बनाते हैं।

बिजली के परिप्रेक्ष्य में हम सोचें तो मुख्यत: तीन तरह के पदार्थ हैं - संवाहक (कंडक्टर, Conductor ) जो बिजली को आसानी से प्रवाहित होने देते हैं, जैसे धातुयें - अल्युमिनियम, तांबा आदि क्योंकि इनकी बाहरी कक्षा के इलेक्ट्रॉन १ या २ हैं जो आसानी से बाहर खींचे जा सकते हैं। दूसरे पदार्थ हैं- विसंवाहक (इंसुलेटर,  Insulator ) जो बिजली को प्रवाहित नहीं होने देते (जब तक अधिक विद्युतीय बल के कारण ब्रेकडाउन न हो जाय)। तीसरे हैं अर्ध संवाहक (सेमी कंडक्टर, Semiconductor ) जो साधारण परिस्थिति में तो विसंवाहक हैं लेकिन विशेष स्थितियों में संवाहक की तरह व्यवहार करते हैं।

ये अर्ध संवाहक आवर्त सारणी के चौथे समूह में हैं - कार्बन, सिलिकॉन, जर्मेनियम इनमे मुख्य हैं। इनकी बाहरी कक्षा में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं  जिन्हें न तो बाहर खींचना आसान होता है और  न ही दूसरे परमाणु से ४ इलेक्ट्रॉनओ ले लेना ही। इसलिये ये परमाणु अपने आस पास के परमाणुओं के साथ इलेक्ट्रॉनों की संयुक्त  भागीदारी करते हैं जिससे कि सभी के ८ इलेक्ट्रॉन पूरे हो जाते हैं।  यह चित्र देखिये।

इस चित्र में हर सिलिकॉन परमाणु के अपने बाहरी ४ इलेक्ट्रॉनों की पड़ोसी ४ परमाणुओं के साथ भागीदारी कर रहा है।  सारे इलेक्ट्रॉन चार नाभिकों के आस पास घूम रहे हैं और मजबूती से बंधे हैं - इसे संयोजी बन्ध (कोवेलेंट बॉन्ड, Covalent Bond) कहते हैं।  इसलिए इन्हें कक्षा से बाहर खींचना बहुत कठिन है।  साधारण परिस्थितियों में (शून्य केल्विन ताप पर) इनमें से कोई भी बाहर नहीं निकल पाता और पदार्थ एकदम अवरोधी की तरह बर्ताव करता है।  

जैसे जैसे तापमान बढ़ कर वातावरण के साधारण तापमान (३०० केल्विन) तक आता है कुछ बंधन टूटते हैं और कुछ इलेक्ट्रॉन कक्षा से बाहर कूद जाते हैं।  एक इलेक्ट्रॉन नाभिक से मुक्त हो विद्युत प्रवाह में सम्मिलित हो सकता है। इस असंतुलन के कारण बन्ध में जो कमी आती है उसे कोटर या रिक्ति  (होल , Hole) कहते हैं और यह भी विद्युत प्रवाह में शामिल होता है, धनावेश के साथ।  यह दूसरे बन्ध के इलेक्ट्रॉनों को अपनी तरफ खींचता है और जैसे ही एक रिक्ति भरती है वैसे ही ठीक वैसी ही दूसरी रिक्ति पड़ोसी बन्ध में बन जाती है।  इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित होने के कारण विद्युत क्षेत्र के धनाविष्ट क्षेत्र की ओर खिंचाव महसूस करते हैं, रिक्तियाँ धनाविष्ट होने के कारण उनकी विपरीत दिशा में चलती हैं। 

ऊपर का जो चित्र है वह एक विशुद्ध या नियमित अर्ध संवाहक (Intrinsic Semiconductor) है। इसमें केवल सिलिकॉन के परमाणु हैं।  इसी तरह जर्मेनियम का भी विशुद्ध अर्ध संवाहक होगा। 

अब सोचिये इस सिलिकॉन में ५वे ग्रुप के कुछ परमाणुओं की मिलावट की जाए तो क्या हो? उनमें हर एक के पास ४+१ = ५ इलेक्ट्रॉन हैं - संयोजी बन्ध की क्षमता से एक इलेक्ट्रॉन अधिक।  ठीक इसी तरह आवर्त सारिणी के समूह ३ में हर एक परमाणु के पास ४-१ = ३ इलेक्ट्रॉन हैं।  ये अनियमित अर्ध संवाहक (Extrinsic Semiconductor) कहलाते हैं।  

इन पर अगली पोस्ट में बात करूँगी।  

रविवार, 10 जुलाई 2016

मनु स्मृति में यात्रा - 3 (शूद्र जुगुप्सित)

पहला भागदूसरा भाग     ... अब आगे
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शूद्रों के प्रति पहला कथित निन्दनीय भाव मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के 31 वें श्लोक में मिलता है। प्रकरण विभिन्न वर्ण-जातकों के नामकरण से सम्बन्धित है। सातत्य और नैरंतर्य पर विचार के लिये क्र. 30 से 33 तक के श्लोक यहाँ दर्शाये गये हैं। पहले ऋग्वेद की एक ऋचा है जिसका महत्त्व आगे समझ में आयेगा। 

श्लोक 31 और 32 शब्द संयोजन में समान हैं और प्रतीत होता है कि किसी एक के आधार पर दूसरे को रचा गया है। विभिन्न वर्णों के नाम जिन लक्षण गुणों वाले होने बताये गये हैं, उनके युग्म इन दो श्लोकों के आधार पर निम्नवत हैं:
ब्राह्मण – मंगल और शर्म
क्षत्रिय – बल और रक्षा
वैश्य – धन और पुष्टि
शूद्र – जुगुप्सित और प्रेष्य
हिन्दी में संस्कृत स्रोत का शब्द जुगुप्सा प्रचलित है जिसका अर्थ निन्दनीय, घृणित आदि से जुड़ता है। अज्ञेय के साहित्य में यह शब्द इसी भाव में सटीक प्रयुक्त हुआ है और मनुस्मृति के भाष्यकारों में अधिकांश ने भी यही अर्थ लिया है। प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में मनुस्मृति के रचयिता शूद्रों के लिये घृणित और निन्दनीय नाम चाहते थे?
विष्णु और कुछ अन्य पुराण श्लोकों के आधार पर (शर्मा, वर्मा, गुप्त और दास) इनकी व्याख्या करने की परम्परा रही है जो कि गाड़ी को बैल के आगे रखने जैसी ही है। मनुस्मृति के आधार पर पुराणों में लिखा गया है न कि उसके उलट। ध्यान दें तो पुनरुक्ति जैसी बात ही दिखती है और 31 वाँ श्लोक संकीर्ण क्षेपककारों द्वारा डाला गया लगता है। विद्वानों ने इसके ऊपर क्षेपक आक्षेप का निराकरण यह बता कर करने का प्रयास भी किया है कि पहला श्लोक नाम से सम्बन्धित है और दूसरा उपनाम और पदवी आदि से। यह एक आधुनिक प्रयास ही है जो कि ठीक नहीं लगता।
आगे बढ़ने से पहले ‘गुप्’ धातु पर विचार करना आवश्यक है। हिन्दी के ‘गोपनीय’ शब्द का उत्स इस संस्कृत धातु में है जिसका सम्बन्ध संरक्षण से है। गोपनीय वह होता है जिसकी रक्षा करनी होती है, छिपाना पड़े तो भी। ऋत् और धर्म आधारित समूची वर्णव्यवस्था समाज संरक्षण भाव के मूल से विकसित हुई है। ऋषियों के लिये धर्मगोप्ता, ऋतगोप्ता आदि विशेषण नाम इसे स्पष्ट करते हैं।
ब्राह्मण का शर्मन् प्रसन्नता और समृद्धि का अर्थ लिये है जिसका कारक ‘शर्मण्य’ है, अर्थ आश्रय देने वाला, रक्षा करने वाला। सुशर्मा या सुशर्मन् नामधारी ऐसा व्यक्ति है जो कि सुरक्षित शरण और स्थान देने वाला हो। धर्मशर्मन् वह है जो धर्म को शरण देता हो। रक्षा भाव ब्राह्मण है।
क्षत्रिय का वर्मन् वर्म अर्थात कवच से बना है। कवच कोमल अंगों की सुरक्षा के लिये पहना जाता है। मर्मस्थलों की सुरक्षा क्षत्रिय का धर्म है, वह समाज का कवच है। रक्षा भाव क्षत्रिय भी है।
वैश्य का गुप्त धन धान्य का गोप्ता भाव लिये हुये है। व्यापार हो, मूल्यवान वस्तुयें हों, खेत हो, शस्य हो, पशु सम्पदा हो इन सबकी रक्षा के लिये गोपनीयता परम आवश्यक है और समाज की उदर पूर्ति करने वाला वैश्य इसे निबाहता है। रक्षा भाव वैश्य भी है।
शूद्र का दास सेवा संरक्षण भाव है। वह प्रेष्य है। प्रेष्य में भी रक्षा भाव है। प्रेष्य वह है जिसे निर्देश आदेश दे काम कराया जाता है। वह विश्वसनीय होता है क्यों कि उद्देश्य की सुरक्षा करते हुये निबाहता है। जब आप पत्र भेजते हैं तो क्या लिखते हैं? प्रेषक – फला फला। आप ने पत्र का दायित्त्व प्रेष्य को दिया जिसने उसे सुरक्षित गंतव्य तक पहुँचा दिया। बेटी बहनों के यहाँ भार ले कर कहाँर पहले जाते थे न, वे भी प्रेष्य थे और आप प्रेषक। डोली में दुल्हन को ले कर जाने वाले भी भरोसे वाले प्रेष्य ही होते थे। वह भरोसे वाला है इसलिये रक्षणीय है। रक्षा भाव शूद्र भी है।
यह टुकड़ा टुकड़ा दिखती सुरक्षा उस ’समाज पुरुष’ की समग्र सुरक्षा है जिसकी कल्पना ऋषियों ने की। जी, पुरुष सूक्त ‘व्यकल्पयन्’ ही कहता है। ऋषि का मस्तिष्क गर्भ है जिसमें समूचे ब्रह्माण्ड को अपने में समेटते हुये मनु संतति का रूप विकसित होता है। उस विराट पुरुष संकल्पना की ऐसी तैसी भाष्यकारों और आज कल के धुरन्धरों ने खूब की, किये जा रहे हैं।     
वर्ण व्यवस्था के मानक अर्थ पर 32 वाँ श्लोक खरा उतरता है क्यों कि वह उस विराटता से जुड़ता है न कि 31 वें की तरह बस मंगल, बल, धन और जुगुप्सा तक सीमित होता है। 31 वाँ श्लोक क्षेपक हो सकता है।
जुगुप्सा शब्द गुप् धातु में इच्छा के अर्थ वाले सन् प्रत्यय के जुड़ने से बना है। सन् प्रत्यय में द्वित्व का विधान है इसलिए एक और गु जुड़ता है। गु+गुप्+सन् के योग में सूत्र प्रयोग के कारण पहला ग ‘ज’ हो जाता है और बनता है जुगुप्सा। ऐसा एक अन्य उदाहरण है पा+सन् = पिपासा जो कि प्यास के लिये प्रयुक्त होता है।
ऋग्वेद (7.103.9) में वसिष्ठ ऋषि मेढकों के माध्यम से 12 महीनों के संवत्सर चक्र की सुरक्षा के लिये जुगुपु: शब्द का प्रयोग करते हैं। पूरे ऋग्वेद में यह एकल प्रयोग है। इसी संरक्षण अर्थ में मनुस्मृति में इसका प्रयोग हो, सम्भावना कम ही लगती है।

अब प्रश्न यह कि ‘जुगुप्सा’ शब्द का अर्थ संकीर्ण हो निन्दित या घृणित कैसे हो गया? हजार वर्षों के उत्थान पतन में शब्द घिसते हैं, कभी छिछले तो कभी गहन अर्थ ले लेते हैं और कभी कभी मूल से इतर उलट भी। समाज भी उठता है, गर्त में जाता है, पुन: पुन: दुहराता है।   

घृणित या निन्दनीय अर्थ परवर्ती है जो स्पष्टत: गुप्तांगों के ढकने से उपजा है। सुरक्षित और गोपनीय रखने वाले ढेर सारे अवयवों में गुप्तांग भी होते हैं जिनका प्रदर्शन घृणित और निन्दनीय होता है। सामाजिक विकृति ने सेवा और भृत्य कर्म करने वालों के लिये ऐसा सोचा ठीक गुप्तांग आधारित गालियों की तरह ही जो कि बहुत बाद में विकसित हुईं। गुप्तांग आधारित गालियाँ संस्कृत में नहीं हैं।
जुगुप्सित शब्द का भाष्यकार कुल्लुक जहाँ स्पष्टत: निन्दावाचक अर्थ करते हैं, वहीं मेधातिथि और नन्दन क्रमश: कृपणकोदीन शबरक और पैलवक जैसे उदाहरण नाम सुझाते हैं।

भाष्यकारों ने एकदम से संरक्षण वाला भाव भुला दिया हो, ऐसा भी नहीं है। राघवानन्द जुगुप्सित लिखते हुये जब द्विजदास और द्विजगुप्त नाम सुझाते हैं तो अनायास ही वैदिक संरक्षण भाव वाले अर्थ से जुड़ जाते हैं, द्विज के संरक्षण में रहने वाला। सेवक की सुरक्षा स्वामी का कर्तव्य तो आज भी है, तब धर्म कहलाता था।
रामचन्द्र वह भाष्यकार हैं जो जुगुप्सित शब्द का प्रयोग ही नहीं करते। वह ‘प्रेष्यसंयुक्तंकुर्यात्’ लिखते हुये  स्पष्टत: संरक्षण योग्य नाम यथा कृष्णदास सुझाते हैं।

महत्त्वपूर्ण यह भी है कि शक संवत 1807 में जब इस ‘मानव धर्म शास्त्र’ का संचयन कर छापने के लिये देश भर से पाण्डुलिपियाँ जुटाई गयीं तो तीन भिन्न भिन्न स्थानों से प्राप्त प्रतियों में ‘जुगुप्सित’ प्रयोग था ही नहीं! उसके स्थान पर प्रेष्य पाठ ही दुहरा दिया गया था।

सोचना आप को है कि बिना गहराई में उतरे समूची सनातन परम्परा को क्षेपकों के आधार पर कलंकित करने वालों के निहितार्थ क्या हैं? और आप स्वयं भी उनके जाल में फँसते क्यों जा रहे हैं? 
(जारी)
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आभार:

श्री दत्ता राज (वैदिकी), 
सुश्री संगीता शर्मा (शब्द, धातु उत्पत्ति) 

रविवार, 19 जून 2016

नक्षत्र परिचय - 2 (ग्रीष्म अयनांत के बहाने)

पहले भाग में हम बता चुके हैं कि लगभग फरवरी से लेकर जुलाई तक का समय नक्षत्र पर्यवेक्षण के लिये उपयुक्त होता है क्यों कि आकाश में बादल नहीं होते, ऋतु भी उपयुक्त होती है, धुन्ध और शीत अनुपस्थित होते हैं। वास्तव में जुलाई का महीना फरवरी की तरह लगभग ही उपयुक्त होता है, कारण यह कि जून के अन्तिम सप्ताह से ही वर्षा ऋतु साँकल बजाने लगती है।

अब तक हम इन नक्षत्रों को कुछ प्रमुख तारकसमूहों के साथ पहचान चुके हैं:     
स्वाति
चित्रा
हस्त
उत्तराफाल्गुनी
मघा
पूर्वाफाल्गुनी
अभिजित
 अब आगे बढ़ते हैं। 

जून ग्रीष्म अयनांत का महीना है। 20/21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य अपने उत्तरी झुकाव के चरम पर होते हैं और सबसे बड़ा दिन होता है। इस वर्ष संयोग अच्छा है। 20 जून को पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र पर होंगे अर्थात जेठ महीने(पूर्णिमांत) का अंत हो जायेगा। 21 जून को ग्रीष्म अयनांत के दिन आषाढ़ का महीना प्रारम्भ होगा। जेठ के महीने में सूर्य की तपन अधिकतम होती है। गाँव गिराम में कहते हैं मिरगा दहकता! मिरगा क्यों? क्यों कि इस समय सूर्य मृगशिरा नक्षत्र में होते हैं।

21 जून को ही सूर्य मृगशिरा से आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे और ईंख की खेती करने वाले किसान ‘अदरा की गुड़ाई’ की तैयारी प्रारम्भ कर देंगे। इस नक्षत्र का नाम संकेतक है कि वातावरण में वर्षा की प्रस्तावना में आर्द्रता अर्थात नमी बढ़ जाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि रामायण काल में कुछ क्षेत्रों में नया वर्ष वृष्टि प्रारम्भ से लगता था और इसीलिये संवत्सर ‘वर्ष’ कहलाता था। वे बताते हैं कि महाविषुव के स्थान पर नववर्ष का प्रारम्भ वर्षा के संकेतक ग्रीष्म अयनांत के दिन अर्थात 21 जून से माना जाता था।

21 जून के दिन उठिये, चार बजे भोर में।  पूरब और उत्तरपूर्व दिशाओं के बीच खड़े हो जाइये। उत्तरपूर्व में सबसे अधिक चमकते दिखेंगे ब्रह्महृदय (Capella), ब्रह्मबेला नाम ध्यान में आया?

मध्य दिशा में मन्द लपलप करता सा मन्द तारकपुंज दिखेगा। यही है देहाती ‘झुलनिया’ या ‘कचपचिया’ या वैदिक कृत्तिका नक्षत्र (pleiades) । जहाँ इसकी टिमटिम और द्युति के कारण सामान्य जन ने नाक में पहना जाने वाला गहना समझा वहीं वैदिक ऋषियों ने अग्नि की लपलप जिह्वा से साम्य पाया – अग्निर्न: पातु कृत्तिका।
 इसके कोरी आँख से दिखने वाले छ: तारों के काटने वाले पुराने शस्त्र कटार से आकृति साम्य के कारण कृत्तिका कहा गया। यही षडानन कार्तिकेय को दूध पिलाने वाली  मातायें हैं जिनकी महिमा अपरम्पार है। 
एक ब्राह्मण ग्रंथ में संवत्सर प्रारम्भ के समय इनके प्राची में अटल रहने के उल्लेख ने ही भारतीय परम्परा के इसाई कालनिर्धारण की धज्जियाँ उड़ा दीं। तैत्तिरीय संहिता का नक्षत्रमंडल इन्हीं ने प्रारम्भ होता है, आज कल की तरह अश्विनी से नहीं। इनके बारे में विस्तारसे यहाँ भी बताया गया है।

इनके बाद सबसे आसान पहचान है अश्विनी या अश्वायुज के दो तारों (Sharatan) की जो कि लगभग पूरब में 30 से 40 अंश के बीच दिखेंगे। कुछ लोग नीचे वाले तारे की अपेक्षा ऊपर के मन्द समांतर तारे को युग्म का भाग बताते हैं। वैदिक जन इनकी प्रशंसा में बहुत छन्द रचे हैं। ये भूलों को मार्ग दिखाने वाले हैं और देवताओं के वैद्य भी – यौ देवानां भिषजौ हव्यवाहौ, विश्वस्य दूतवमृतस्य गोपौ।
अश्विनियों से ऊपर प्राची में ही मीन राशि के दो तारे दिखते हैं जिनका स्थान नक्षत्र मण्डल की अंतिम रेवती का है। कृत्तिका और अश्विनियों के बीच दिखती हैं भरणी (Torcularis)। यदि आप साढ़े चार बजे तक रुक गये और भूदृश्य स्पष्ट हो तो क्षितिज के पास दिख जायेंगे बुध ग्रह और रोहिणी (Aldebaran) नक्षत्र - साथ साथ। महाभारत काल में महाविषुव मृगशिरा नक्षत्र से खिसक कर रोहिणी नक्षत्र पर आ चुका था। रोहिणी के बारे में कुछ और इस लिंक पर।

रात पौने दस बजे के आसपास दक्षिण से दक्षिण-पूर्वी आकाश में चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, अनुराधा के साथ मूल नक्षत्र। साथ में वृक और वृत्र तारामण्डल। पूरब में गरुड़ (Aquila, Altair)
 पहले दक्षिण में देखिये, वृक और वृत्र तारासमूह अपने आकार और तारों की बहुलता से स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं।
 नीचे क्षितिज के पास दो बहुत तेज चमकते ताराओं से ऊपर जाइये, चित्रा (Spica) मिलेंगी। पूरब की ओर बढ़िये। दक्षिण-पूर्व से थोड़ा पहले ही वृश्चिक या रामायण में वर्णित ‘ऐरावत की सूँड़’ (Scorpio) स्पष्ट दिखती है। इसी में अनुराधा और ज्येष्ठा हैं। बिच्छू का डंक ही मूल नक्षत्र है। चित्रा और मूल को मिलाने वाली रेखा पर तुला राशि में हैं विशाखा (Brachium) 

ठीक पूरब दिशा में हैं गरुड़ जी जिन्हें एक तेज चमकते तारे के परिवेश में देखा जा सकता है। पूर्ण चन्द्र के प्रकाश के कारण थोड़ी कठिनाई हो सकती है। मई उत्तरार्द्ध से जून पूर्वार्द्ध तक रात साढ़े ग्यारह बजे से नौ बजे के बीच कृष्ण पक्ष में इन्हें आसानी से देखा जा सकता है। 


(क्रमश: )             

सोमवार, 23 मई 2016

ज.ने.वि. का अंत:पुर – 1

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कुल 14 संस्थान हैं जिन्हें School कहा जाता है। इन संस्थानों के भीतर एकाधिक केन्द्र हैं।
प्रारम्भ करते हैं ‘भारतीय भाषा केन्द्र’ से। इस केन्द्र की निम्न विशेषतायें हैं:
(1) इस केन्द्र में कुल छ: आचार्य हैं।

(2) 2010-11 से 2014-15 के बीच पाँच वर्षों में यहाँ के आचार्यों ने कुल 144 शोध पत्र विश्वविद्यालय से बाहर प्रकाशित किये।

(3) इस केन्द्र को यह नहीं पता कि उसका बजट कितना है।

(4) इस केन्द्र को यह भी नहीं पता है कि यह कुछ उपार्जित करता भी है या नहीं।

(5) उक्त पाँच वर्षों में इस केन्द्र ने कुल 152 पी. एच. डी डिग्रियाँ बाँटीं जिनके कुछ मुख्य बिन्दु ये हैं:

§  हैं ग विश्वविद्यालय के केन्द्र को इनमें से किसी के बारे में यह नहीं पता कि उसे डिग्री प्राप्त करने में कितना समय लगा।
§  केन्द्र  केन्द्र के अध्यक्ष डॉ. एस एम अनवर आलम हैं। कुल 152 डिग्रियों में से 58 डिग्रियाँ मुसलमानों को बाँटी गयी हैं।
§  58  इन 58 मुसलमानों में से 55 ने मुसलमान आचार्यों के निर्देशन में अपनी डिग्रियाँ लीं। 2 ने संयुक्त निर्देशन में प्राप्त कीं, जिनमें से एक आचार्य मुसलमान ही रहा।
§  सभी 58 मुसलमानों ने लगभग पूर्णत: मुस्लिम साहित्यकार या उर्दू या मुस्लिम सम्बन्धित विषय पर ही काम किया। इक्के दुक्के जिन ग़ैर मुस्लिम साहित्यकारों पर शोध किया गया वे भी उर्दू से ही सम्बन्धित थे।  
§  नौ ने पाकिस्तान से सम्बन्धित विषयों या साहित्यकारों पर काम किया जिनमें से अधिकांश के निर्देशक डॉ. आलम रहे।
§  किसी भी ग़ैर-मुस्लिम शोधार्थी ने उर्दू में/पर शोध नहीं किया।   
§  सात डिग्रियाँ हिन्दी उर्दू के तुलनात्मक अध्ययन से सम्बन्धित शोध के लिये बाँटी गईं।
§  केन्द्र के लिये भारतीय भाषा का अर्थ बस उर्दू और हिन्दी ही है। भारत की अन्य भाषाओं में कोई शोध नहीं हुआ।
§  हिन्दी में/से अनुवाद से सम्बन्धित अध्ययन की भाषायें राजस्थानी, बँगला, चेक, कोरियाई, मैथिली (सभी एक एक) और अंग्रेजी (दो) रहीं।
§  किसी भी अन्य भारतीय भाषा से तुलनात्मक काम नहीं हुआ।

(6) केन्द्र के पास विद्यार्थियों द्वारा बाहर या भीतर शोध पत्र प्रकाशन से सम्बन्धित कोई सूचना नहीं है।

यू एस न्यूज की वैश्विक गुणवत्ता में यह विश्वविद्यालय भारत के शीर्षस्थ 14 में भी नहीं है अर्थात वैश्विक रैंकिंग में प्रथम 729 में भी इसका नाम नहीं है। चूँकि वह पूँजीवादी बुर्जुवा रैंकिंग है इसलिये उसे अधिक महत्त्व देना ठीक नहीं है। 

गुणवत्ता, प्रगतिशीलता, निष्ठा और कार्यकलाप आदि का निर्णय पाठक स्वयं करें।  

(अगले अंक में एक नया केन्द्र)